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अगर दोनों माता-पिता शुगर (डायबिटीज) के मरीज हैं, तो उनके बच्चों में डायबिटीज का खतरा बढ़ सकता है, लेकिन यह निश्चित नहीं है कि बच्चे को डायबिटीज होगी ही। अनुवांशिकता एक महत्वपूर्ण कारक है, लेकिन पर्यावरणीय प्रभाव, जीवनशैली और खान-पान की आदतें भी बड़ी भूमिका निभाती हैं। यदि माता-पिता अपनी दिनचर्या को नियंत्रित नहीं करते हैं और अस्वस्थ जीवनशैली अपनाते हैं, तो यह संभावना और बढ़ सकती है कि बच्चे भी उसी राह पर जाएं।
टाइप 1 डायबिटीज आनुवंशिक और ऑटोइम्यून कारणों से होती है, लेकिन इसके होने की संभावना कम होती है। यदि माता-पिता में से किसी को टाइप 1 डायबिटीज है, तो बच्चे में इसके विकसित होने की संभावना लगभग 5-10% होती है। यदि दोनों माता-पिता को टाइप 1 डायबिटीज है, तो यह संभावना बढ़कर लगभग 25% तक हो सकती है। हालांकि, यह भी जरूरी नहीं कि हर स्थिति में ऐसा हो। टाइप 1 डायबिटीज का मुख्य कारण शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का पैनक्रियास की बीटा कोशिकाओं पर हमला करना होता है, जिससे इंसुलिन का उत्पादन बंद हो जाता है। कुछ मामलों में, वायरस संक्रमण और अन्य पर्यावरणीय कारक इस बीमारी को ट्रिगर कर सकते हैं।
टाइप 2 डायबिटीज अधिकतर जीवनशैली, खान-पान और आनुवंशिकता से जुड़ी होती है। अगर दोनों माता-पिता को टाइप 2 डायबिटीज है, तो बच्चे में इसका जोखिम 50-70% तक हो सकता है, खासकर अगर उनका खान-पान और जीवनशैली सही न हो। इस प्रकार की डायबिटीज अधिकतर उन लोगों में पाई जाती है जो शारीरिक रूप से कम सक्रिय होते हैं, उच्च कार्बोहाइड्रेट और शुगर वाले आहार का सेवन करते हैं और जिनका वजन अधिक होता है। अनियमित दिनचर्या, तनाव और नींद की कमी भी डायबिटीज के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।
हालांकि, स्वस्थ जीवनशैली, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और सही वजन बनाए रखने से डायबिटीज के खतरे को कम किया जा सकता है। बच्चों में इस जोखिम को कम करने के लिए माता-पिता को खुद भी एक अनुशासित और हेल्दी जीवनशैली अपनानी चाहिए। फाइबर युक्त आहार, कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले खाद्य पदार्थ, नियमित एक्सरसाइज, पर्याप्त पानी का सेवन और सही मात्रा में नींद लेने से शरीर का ब्लड शुगर स्तर नियंत्रित रहता है। इसके अलावा, समय-समय पर ब्लड शुगर लेवल की जांच कराना भी जरूरी होता है ताकि यदि कोई लक्षण नजर आए तो समय रहते उचित कदम उठाया जा सके।
यदि माता-पिता को पहले से डायबिटीज है, तो उन्हें गर्भावस्था के दौरान भी विशेष ध्यान रखने की जरूरत होती है। गर्भकालीन डायबिटीज (गेस्टेशनल डायबिटीज) की संभावना अधिक हो सकती है, जिससे बच्चे का वजन अधिक बढ़ सकता है और भविष्य में उसे भी डायबिटीज होने का खतरा बढ़ सकता है। गर्भवती महिलाओं को नियमित रूप से अपनी ब्लड शुगर की निगरानी करनी चाहिए और डॉक्टर की सलाह के अनुसार डाइट और एक्सरसाइज पर ध्यान देना चाहिए।
हालांकि आनुवंशिकता एक महत्वपूर्ण कारक है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि डायबिटीज को रोका नहीं जा सकता। यदि माता-पिता खुद स्वस्थ आदतें अपनाते हैं और बच्चों को भी अच्छा खान-पान, एक्सरसाइज और हेल्दी लाइफस्टाइल की शिक्षा देते हैं, तो डायबिटीज के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।